इंसानी जज़्बात एक कहानी

अपने घर के बाहर चबूतरे पर बैठी सुगंधा एकटक मोहन को देख रही थी. आज पूरे साप्ताह दिन बाद मोहन उसे दिखाई दिया था. ना जाने वो कहाँ चला गया था.मोहन, रामचरण मौुची का लड़का था. बचपन से वो अपने ननिहाल में रहा था. अभी महीना दिन पहले वो इस गाव में आया था. उसका घर सुगंधा के घर से कुच्छ ही घर की दूरी पर था.

पहले ही दिन जब उसने सुगंधा को देखा तो देखा तो देखता ही रह गया था. उसकी मोहिनी सूरात और उसकी बड़ी बड़ी झील सी गहरी आँखे उसके दिल में उतराती चली गयी थी. उस दिन से उसकी नज़रें सिर्फ़ और सिर्फ़ सुगंधा पर ही टिकी रहती थी. वो हरदम उसे देखने के लिए व्याकुल रहता था. धीरे धीरे सुगंधा को भी इसका एहसास हो गया की मोहन उसे चोरी छ्चीपे देखता है. लेकिन सुगंधा अभी प्यार के ज़ज़्बात से अंजान थी.

वो नही समझ पाई के मोहन उसे इस तरह क्यो देखता थाई. पहले पहल तो उसे मोहन का इस तरह देखना बड़ा अटपटा लगता था. फिर बाद में उसे भी मज़ा आने लगा. उसने मोहन को परेशन करना शुरू किया. जब कभी मोहन उसकी और देखता सुगंधा खुद को सहेलियों के पिच्चे छ्चीपा लेती या घर के अंदर चली जाती. फिर कुच्छ देर बाद उसे अपना रूप सौंदर्या दिखाने खुद ही दरवाज़े पर आ जाती. अब देखती के मोहन दरवाज़े पर नही है तो उसे बुलाने के लिए ज़ोर ज़ोर से सहेलियों से बातें कराती. अकारण ही किसी बच्चे को उँची आवाज़ में डाँतति ताकि मोहन के कानो तक उसकी आवाज़ पहुँचे. मोहन उसकी आहत पाते ही बाहर आ जाता. तब सुगंधा फिर से घर के अंदर चली जाती. उसके लिए यह एक मज़ेदार खेल था. किंतु उसे नाती पता था यह खेल एक दिन उस पर कितना भारी पड़ने वाला है.

एक दिन रोज़ की तरह सुगंधा अपने दरवाज़े पर बैठी सहेलियों से बातें कर रही थी. मोहन को सुनने के लिए बात बात पर खिलखिला रही थी. लेकिन काफ़ी देर तक जब मोहन बाहर नही आया तो उसे ताज़्ज़ूब हुआ. उसने एक एक करके अपने सारे हथकंडे अपनाए. पर जिसे ना आना था वो कहाँ से आता. सुगंधा मायूस हो गयी. पूरा दिन गुज़र गया पर मोहन उसे दिखाई नही दिया. उसने सोचा क्यों ना उसके घर ही जाकर देख लूँ वा घर पर है या नही. फिर संकोच की एक बेदी उसके पावं में प़ड़ गयी. उसने सोचा, पता नही मोहन क्या सोचेगा. मैं उसे क्यों पुच्छने आई हूँ. उसके घर वाले क्या सोचेंगे. वो मॅन मार कर रह गयी. दूसरा दिन भी इसी तरह बीता. सुगंधा कभी घर के अंदर होती तो कभी बाहर. पर उसका मॅन कहीं भी नही लग रहा था. मोहन को ना पाकर उस पर गुस्सा भी कर रही थी. ना जाने वो कहाँ चला गया. दो दिन और गुज़र गये. अब उसकी हालत ऐसी हो गयी के उसे ना तो खाना अच्छा लगता था और ना ही सोना. रात दिन मोहन के बड़े में ही सोचती रहती थी. फिर एक दिन उसका मुरझाया चेहरा खिला. सातवे दिन शाम के वक़्त, मोहन रोज़ की ही तरह दरवाज़े पर खड़ा नज़र आया. आज वोही दिन है. आज सुगंधा उसे देख कर रोज़ की तरह नही चीपी. आज उसे देखते ही घर के अंदर नही भागी. आज उसका मॅन उसे जी भर कर देखने को कर रहा था. और वो उसे देखती रही. मोहन भी हैरान था. उसे ताज़्ज़ूब हो रहा था की आज सुगंधा उसे देख कर छ्चीप क्यों नही रही है? उसने देखा गली में कोई नही है. सन्नाटा पसरा है. अचानक वो उठा और आकर उसी चबूतरे पर बैठ गया जिस पर सुगंधा बैठी थी. उसे इतना समीप बैठे देख सुगंधा को थोड़ी घबराहट हुई पर कहा कुच्छ नही. बस शर्मा कर नज़रें नीची कर ली. मोहन ने उसकी आँखों में देखा. वहाँ उसके लिए अथाह प्यार का सागर दिखाई दिया. मोहन यह तो समझ गया की सुगंधा भी उससे प्यार करने लगी है. लेकिन बात कहाँ से शुरू करे उसके समझ में नही आ रहा था. शुरुआत सुगंधा ने ही की. पुचछा – “तुम कहीं गये थे?”

“हन…” मोहन मुस्कुराया. – “मामा के घर. पीताजी ने ज़रूरी काम से भेजा था.”

“एक बात पुच्छू तुमसे?” सुगंधा ने झिझकते हुए कहा- “तुम रोज़ अपने दरवाज़े पर खड़े होकर मुझे क्यों देखते हो?”

“क्या तुम नही जानती?” मोहन ने उसकी आँखों में झाकते हुए उसी से सवाल किया.

सुगंधा शर्मा गयी. श्रमकर नज़रें नीची कर ली. अब उसके अंदर प्यार का अंकुर फुट चुका था. अब वो जान गयी थी के मोहन उसे क्यों देखता है.

“तुम बहुत खूबसूरात हो सुगंधा. मेरा दिल कराता है तुम्हे हमेशा देखता रहूं.” मोहन अत्यंत गंभीर होकर बोला.

उसके मूह से अपनी प्रशंसा सुनकर सुगंधा को बहुत अच्छा लगा. उसने प्यार से मोहन को देखा. दिल किया उस पर अपनी जवानी लूटा दे.

“सुगंधा, तुमसे और भी बहुत कुच्छ कहना चाहता हूँ. पर यहाँ कहते ड्ऱ लगता है. किसी ने सुन लिया तो गड़बड़ हो जाएगी. तुम कहीं अकेले में मिलॉगी?”

“नही.” सुगंधा धीरे से फुसफुसा. -“मुझे ड्ऱ लगता है. किसी ने देख लिया तो?”

“कोई नही देखेगा. तुम्हारे घर के पिच्चे जो खेत है ना. वहीं आ जाओ. वहीं बैठकर हम ढेर सारी बातें करेंगे.”

“रात में नही आ सकती. लेकिन शाम ढलते ही शौच के बहाने से वहाँ आ जौंगी. तब तुम भी आ जाना. अब तुम जाओ कोई देख लेगा.”

“ठीक है.” मोहन मुस्कुराया. उसके लिए इतना ही काफ़ी था की सुगंधा ने उसका प्रेम परस्ताव स्वीकार कर लिया था. वो उठा और घर के रास्ते बढ़ गया.

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